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गाय है तो गाँव है नारे के साथ हनुमानगढ़ में निकली जन जागरूकता रैली

गाय है तो गाँव है नारे के साथ हनुमानगढ़ में निकली जन जागरूकता रैली सीधी। विंध्य की आवाज कुबेर तोमर जब संदेश सच्चा हो और आवाज़ ईमानदार, तो उम्र मायने नहीं रखती। इसी ...

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गाय है तो गाँव है नारे के साथ हनुमानगढ़ में निकली जन जागरूकता रैली

सीधी। विंध्य की आवाज कुबेर तोमर

जब संदेश सच्चा हो और आवाज़ ईमानदार, तो उम्र मायने नहीं रखती। इसी सच्चाई को साबित करते हुए ऋषिकेश फाउंडेशन की बाल सेना मोगली पलटन ने आज 11 जनवरी 2026 को सीधी जिले के हनुमानगढ़ ग्राम में “गाय है तो गाँव है” के गगनभेदी नारे के साथ एक ज़ोरदार जन-जागरूकता रैली निकालकर पूरे क्षेत्र को सोचने पर मजबूर कर दिया।

यह रैली केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि गौ-संरक्षण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक चेतना को बचाने की हुंकार थी। प्रत्येक माह के दूसरे रविवार को आयोजित होने वाली इस मुहिम के तहत इस बार रैली का विषय “गाय है ता गाँव है” रखा गया, जिसने यह साफ संदेश दिया कि गाय के बिना गाँव की कल्पना अधूरी है।

प्रतिमा स्थल से उठा संदेश, पूरे गाँव में गूंजा

रैली का शुभारंभ ग्राम हनुमानगढ़ स्थित स्वर्गीय श्री चन्द्रप्रताप तिवारी की प्रतिमा स्थल से हुआ। बच्चों, युवाओं और ग्रामीणों का काफ़िला हाथों में संदेश तख़्तियाँ और जुबान पर नारे लिए गाँव की मुख्य सड़क से होते हुए दूसरे छोर तक पहुँचा।

साइकिल रैली ने लोगों का विशेष ध्यान खींचा और हर उम्र के व्यक्ति को इस अभियान से जोड़ दिया।

आज की सच्चाई : गाय सड़कों पर, गाँव संकट में

आयोजकों ने रैली के दौरान तीखे शब्दों में कहा कि—

एक तरफ़ आवारा पशुओं की समस्या गाँवों को तबाह कर रही है

दूसरी तरफ़ दूध की भारी किल्लत है

किसान यूरिया-डीएपी के लिए लाइनें लगा रहा है

देश डायबिटीज़ की विश्व राजधानी बनता जा रहा है

युवा बेरोज़गारी से टूट रहा है

और गायें हाईवे पर कुचली जा रही हैं

यह सब किसी एक समस्या का नहीं, बल्कि गाय से कटते चले गए गाँव की तस्वीर है।

गाय : सिर्फ दूध नहीं, सम्पूर्ण समाधान

रैली के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि गाय केवल दूध देने वाला पशु नहीं, बल्कि—

रसायन मुक्त खेती की आधारशिला

किसानों की लागत घटाने का माध्यम

स्वास्थ्य सुधार का प्राकृतिक उपाय

और गाँव की आत्मनिर्भरता की रीढ़ है

आयोजकों ने एक स्वर में कहा—

“गाय मजबूत होगी, तभी गाँव मजबूत होंगे… और गाँव मजबूत होंगे, तभी देश बचेगा।”

नारों में बोली माटी की आवाज़

रैली के दौरान ग्रामीण संस्कृति और लोक चेतना से जुड़े नारे वातावरण में गूंजते रहे—

गोबर न होय मोहर आय”

“माटी कहै नरियाय के, गोबर नाबा गाय के”

“गोबर वाली खादी नाबा, बीपी-शुगर से जिउ छोड़वा”

“कुठिला बखरी उतराय चले, जेके खेते बरदा गाय चले

इन नारों ने साफ कहा कि गोबर, गौ-आधारित खेती और स्वदेशी जीवनशैली ही स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यावरण का स्थायी रास्ता है।

बाल सेना बनी चेतना की मशाल

ऋषिकेश फाउंडेशन की बाल सेना मोगली पलटन ने यह साबित कर दिया कि यदि बच्चों को सही दिशा मिले, तो वे सिर्फ़ भविष्य नहीं, वर्तमान भी बदल सकते हैं।

यह रैली एक चेतावनी भी थी और एक उम्मीद भी — कि अगर अब भी

नहीं चेते, तो गाँव नहीं बचेंगे।