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शिव मंदिर बढौरा वायरल वीडियो पर सियासत तेज, लेकिन क्या श्रद्धालुओं की जान बचाने वाले पुलिसकर्मी पर उठने चाहिए सवाल-?

शिव मंदिर बढौरा वायरल वीडियो पर सियासत तेज, लेकिन क्या श्रद्धालुओं की जान बचाने वाले पुलिसकर्मी पर उठने चाहिए सवाल-? सीधी। बढ़ौरा नाथ शिव मंदिर में अधिकमास के अंतिम सोमवार को उमड़ी भारी ...

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शिव मंदिर बढौरा वायरल वीडियो पर सियासत तेज, लेकिन क्या श्रद्धालुओं की जान बचाने वाले पुलिसकर्मी पर उठने चाहिए सवाल-?

सीधी। बढ़ौरा नाथ शिव मंदिर में अधिकमास के अंतिम सोमवार को उमड़ी भारी भीड़ के बीच सामने आए एक वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। कुछ लोग वीडियो के आधार पर पुलिसकर्मी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, तो वहीं बड़ी संख्या में लोग इसे एक जिम्मेदार पुलिसकर्मी द्वारा संकट की घड़ी में निभाए गए कर्तव्य के रूप में देख रहे हैं।

मंदिर परिसर का गर्भगृह और निकासी मार्ग बेहद संकीर्ण है। हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है जब लोग एक-दूसरे पर गिरने लगते हैं और भगदड़ जैसी आशंका पैदा हो जाती है। वायरल वीडियो में भी कुछ ऐसा ही दृश्य दिखाई दे रहा है। वीडियो में साफ नजर आता है कि पुलिसकर्मी पहले सामान्य रूप से अपनी ड्यूटी कर रहा है, लेकिन जैसे ही भीड़ का दबाव बढ़ता है और श्रद्धालुओं की सुरक्षा खतरे में पड़ती है, वह तुरंत सक्रिय होकर लोगों को भीड़ से बाहर निकालने लगता है।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि उस समय हालात ऐसे थे कि कुछ सेकंड की देरी भी किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती थी। ऐसे में पुलिसकर्मी ने नियमों की किताब नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। भीड़ में फंसे श्रद्धालुओं को बाहर निकालने के लिए उसने जो भी कदम उठाए, उनका उद्देश्य केवल लोगों को सुरक्षित बचाना था।

स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि मंदिर परिसर में पर्याप्त बैरिकेडिंग, अलग प्रवेश और निकासी मार्ग, महिला-पुरुष श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थित कतारें और भीड़ नियंत्रण की आधुनिक व्यवस्था होती, तो ऐसी स्थिति ही क्यों बनती? उनका मानना है कि व्यवस्था की खामियों का ठीकरा केवल मौके पर ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मी के सिर फोड़ना उचित नहीं है।

कई लोगों ने यह भी कहा कि वीडियो का एक छोटा हिस्सा देखकर निष्कर्ष निकालना आसान है, लेकिन उस समय की वास्तविक परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। जब हजारों लोगों की भीड़ एक साथ आगे बढ़ रही हो और श्रद्धालु एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगें, तब मौके पर तैनात जवान का पहला दायित्व लोगों की जान बचाना होता है।

जानकारों का मानना है कि बड़े धार्मिक आयोजनों में भीड़ नियंत्रण एक सामूहिक जिम्मेदारी होती है, जिसमें मंदिर प्रबंधन, मेला समिति, प्रशासन और पुलिस सभी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि व्यवस्थाएं मजबूत हों तो पुलिस को इस तरह की आपात स्थिति का सामना कम करना पड़े।

फिलहाल वायरल वीडियो को लेकर राजनीति और आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं, लेकिन एक बड़ा वर्ग यह सवाल भी उठा रहा है कि जिस पुलिसकर्मी ने संभावित हादसे को रोकने और श्रद्धालुओं को सुरक्षित निकालने के लिए जोखिम उठाया, क्या उसे कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए या उसके कर्तव्यनिष्ठ प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए?

भीड़ के दबाव में ड्यूटी निभा रहे जवान पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन हजारों श्रद्धालुओं की सुरक्षा के बीच खड़े होकर निर्णय लेना उतना ही कठिन। बढ़ौरा नाथ मंदिर की घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठें या फिर उन लोगों पर, जो संकट की घड़ी में लोगों की जान बचाने के लिए सबसे आगे खड़े दिखाई देते हैं।

विंध्य की आवाज सीधी कुबेर